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The constitution of India part - 2

The constitution of India

The constitution of India
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संविधान का निर्माण


संविधान के निर्माण का ख्याल सबसे पहले गाँधी जी के दिमाग में आया था और उन्होंने सन 1924 में इस विचार को सबके सामने रखा था. संविधान सभा का सबसे पहला ख्याल 1934 में वाम पंथी आन्दोलन के नेता मानवेन्द्रनाथ ने रखा था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1935 में संविधान सभा के निर्माण की मांग की गई थी। नेहरू ने 1938 में संविधान निर्माण का कार्य करने के लिए संविधान सभा की मांग की थी। जिस मांग को 1940 में अगस्त प्रस्ताव से ब्रिटिश सरकार के द्वारा स्वीकार किया गया। 1942 में ब्रिटिश सरकार के मंत्री सर स्टेफर्ड क्रिप्स संविधान के निर्माण के लिए ब्रिटिश सरकार के प्रस्ताव के साथ भारत आए किन्तु मुस्लिम लिंग ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया क्योंकि लिंग के मत अनुसार भारत के 2 स्वतंत्र हिस्से करने है और दोनों के संविधान भी अलग - अलग होना चाहिए। मुस्लिम लिंग की इस मांग को कैबिनेट ने अस्वीकार किया और एक संविधान सभा का प्रस्ताव दिया गया।

संविधान सभा के सभ्य


संविधान सभा मे कुल 389 सभ्य। जिनमे से 296 ब्रिटिश प्रान्त के और 93 सभ्य देसी राजवाड़े थे। इन ब्रिटिश सभ्यो मेसे 292 सभ्य 11 प्रान्त के गवर्नर के अधीन और 4 सभ्य मुख्य कमिश्नर रेट विस्तार मेसे जैसे कि दिल्ली अजमेर फुर्ग, ब्रिटिश बलूचिस्तान। यह सभ्य प्रत्येक 10 लाख की वस्ति पे 1 थे। 3 जुलाई 1947 माउंट बेटन की योजना के बाद भारत का बटवारा हुआ और संविधान सभा मे 389 सभ्य मेसे 299 सभ्य बाकी बचे जिन मेसे 229 ब्रिटिश प्रान्त के और 70 सभ्य देशी राजवाड़ा के थे।

संविधान सभा के निर्माण की प्रक्रिया


सर्वप्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 के दिन संसद के सेंट्रल हॉल के तहत। जिसमे मुस्लिम लिंग ने बहिष्कार किया और अलग पाकिस्तान की मांग की। कार्यवाही चालू करने के लिए सभा के सबसे वरिष्ठ सभ्य सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्ष के रूप में निमणुक हुई। 11 दिसंबर 1946 के दिन नहेरु ने उद्देश्य प्रस्ताव जारी करके संविधान निर्माण का कार्य शुरू किया जिसको 22 जनवरी 1947 के दिन सभा द्वारा स्वीकार किया गया। संविधान सभा संविधान निर्माण के साथ ही धारा सभा भी थी। यह दोनों कार्य अलग अलग दिन में होते थे और ऐसे यह आज़ाद भारत की पहली संसद हुई। संविधान के निर्माण के लिए डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष चुना गया। और धारा किय कार्य के लिए G.V मावडंकर को अध्यक्ष बनाया गया। संविधान सभा को संविधान बनाने के लिए 11 सत्र में 2 वर्ष 11 महीने और 18 दिनों का समय लगा जिसमे कुल 166 बैठक हुई थी। संविधान के निर्माण के कार्य मे कुल 64 लाख रुपए का खर्च आया। संविधान को अंतिम बार पढ़ने के लिए 14 नवंबर 1949 को बैठक हुई जो 26 नवंबर 1949 को खत्म हुई। 26 नवंबर 1949 में संविधान के निर्माण का कार्य संपन्न होने के बाद 299 सभ्यो मे से 284 सभ्योने अपने हस्ताक्षर कर के सर्वानुमति से इसे लागू किया। जब संविधान अमल में आया तब 395 अनुरछेद, 8 अनुसूची और 22 भाग का समावेश हुआ था। अमविधान की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई थी जिसमे डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। और इस संविधान को बनाने के लिए विश्व के 60 देशों के संविधान का अभ्यास किया गया था।

संविधान सभा के अन्य कार्य


सन 1949 में भारत को राष्ट्र मंडल में सदस्यता मिली। 22 जुलाई 1947 के दिन भारत के राष्ट्रध्वज को अपनाया गया। 24 जनवरी 1950 को भारत के राष्ट्रीय गीत को अपनाया गया और 24 जनवरी 1950 को ही डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद भारत मे राष्ट्रपति के रूपमे चुने गए। 

संविधान का अमल


4 नवंबर 1948 के दिन आंबेडकर ने सभा मे संविधान का अंतिम प्रारूप जारी किया। 4 नवंबर से लेकर 9 नवंबर 1948 तक संविधान पर चर्चा हुई उसको संविधान की प्रथम पढ़ाई मानी जाती है। संविधान सभा मे संविधान की दूसरी पढ़ाई 15 नवंबर 1948 से लेकर 17 अक्टूबर 1949 तक चली जोकि संविधान की सबसे लंबी चलने वाली पढ़ाई मानी गई है। 14 नवंबर से लेकर 26 नवंबर 1949 तक संविधान की तीसरी पढ़ाई मानी गई है। डॉक्टर आंबेडकर The constitution is settled by the assembly be passel प्रस्ताव जारी किया जो कि 26 नवंबर 1949 के दिन स्वीकार किया गया। जब कि पूरे संविधान का अमल 26 जनवरी 1950 से अमल में आया। लेकिन 26 नवंबर 1949 से कुछ प्रकार की कलम अमल में आयी थी जैसे कि नागरिकता, संसद, चुनाव, कामचलाऊ जोगवाई, वग़ैरा। संविधान सभा ने भीम राव आंबेडकर को भारत के विविध मंत्री बनाए जिसके कारण संविधान के पिता का बिरुद डो आंबेडकर को मिला। आधुनिक मनु की उपमा भी आंबेडकर को दी गई। 

संविधान सभा के बारेमे


सबसे ज़्यादा सभ्य वाला ब्रिटिश प्रांत संयुक्त प्रांत है जिसमे 55 सभ्य है। सबसे ज़्यादा सभ्य वाला देशी राजवाड़ा मैसूर का है जिसमे 7 सभ्य है। सबसे कम सभ्य वाला राजवाड़ा हैदराबाद है। डो आम्बेडकर पश्चिम बंगाल मे से चुन कर आए थे। अग्रणी नेता जैसे कि जवाहरलाल नहेरु डो राजेन्द्रप्रसाद मुखर्जी मौलाना अब्दुल कलाम आमीद और सरदार बलदेव सिंग। स्त्री सभ्य सरोजिनी नायडू, विजयालष्मी पंडित। संविधान के निष्णात डो आंबेडकर अल्लादी कृष्ण स्वामी अयर और कनैयालाल मुनशी। एंग्लो इंडियन के प्रतिनिधि फ्रेंक एंथनी थे। गुजराती महिला सभ्य हंसाबेन महेता। पारसियों के प्रतिनिधि H.P मोदी अनुसूचित जाति की सभ्य संख्या 30 थी। जिसमे हैदराबाद राजवाड़ा के प्रतिनिधि ने भाग नही लिया था। 26 नवंबर 1949 को संविधान का कार्य खत्म हुआ और जिसके ऊपर 299 मेसे 284 सभ्यो ने हस्ताक्षर किए। शरुआत से 395 अनुरछेद 8 अनुसूचित और 22 भाग थे। बंधारण सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई जिसमें डो राजेंद्रप्रसाद भावत के प्रथम राष्ट्रपति के तौर पर चुने गए। संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा ने 60 देशो के संविधान को स्टडी किया था।

भारत के संविधान की विशिष्टता


यह विश्व का सबसे बड़ा संविधान है। जिसका प्रारम्भ आमुख से होता है।यह संविधान प्रजा के प्रतिनिधि के द्वारा तैयार किया गया है। यह दस्तावेजी लिखित बंधारण है। इसमें पुख्तवय मताधिकार को स्वीकार किया गया है। देवनागरी लिपि वाली हिंदी को राष्ट्र भाषा का स्थान दिया गया है. मुलभुत हक़ और मुलभुत फ़र्ज़. विशिष्ट प्रकार का समवायतंत्र.

आमुख


हम भारत के लोग भारत को सर्वभौम बिनसांप्रदायिक समाजवादी लोकशाही प्रजासताक बनने के लिए और उसके सभी नागरिको को सामाजिक आर्थिक और राजकीय न्याय, विचार, वाणी, मान्यता, धर्म, और प्रजाकी स्वतंत्रता.

प्रतिस्था और तकनी


समानता और व्यक्ति के गौरव शब्द की एकता और अखंडीतता के लिए भाई चारा रखने का दृढ संकल्प करके हमारी संविधान सभा में आज 26 नवम्बर 1949 के दिन यह संविधान अपना रहे है और खुदको समरपित करते है.

जवाहरलाल नेहरु द्वारा पास किया गया उद्देश्य प्रस्ताव को बंधारण के आमुख के रूप में स्वीकारा गया. आमुख में 42 वा संविधान सुधार के ज़रिये पहली बार 3 नए शब्द को ऐड किया गया. आमुख को संविधान समजनेकी चाबी कहा जाता है. आमुख को संविधान का आत्मा कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट 1973 में केशवा नंद भारती के खिलाफ किये गए स्टेट केस 1971 के तहत कहा गया है कि आमुख संविधान का एक भाग है और संसद आमुख में कुछ भी बढ़ाना चाहती है तो वह ऐसा कर सकती है लेकिन आमुख के मूल अर्थ को नही बदल सकती। 

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