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The constitution of India part - 1

 The constitution of India

The constitution of India
The constitution of India


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोक तांत्रिक देश है और इससे बड़ा लोकतंत्र आपको दुनिया मे कही नही मिलेगा। भारत का संविधान भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बनने में मदद करता है तो आइए जानते है भारत का संविधान।

आमुख


13 दिसंबर 1946 में भारत मे बंधारण की सभा चल रही थी उसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को रखा गया था जिसको आमुख कहा गया है और 22 जनवरी 1947 के दिन इस प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई।
आमुख में मुख्यतवे तीन प्रकार के न्याय के बारेमे बताया गया है।

सामाजिक न्याय
आर्थिक न्याय
राजकीय न्याय


और इन तीनो न्याय के सिध्दांतो को 1917 के रशियन क्रांति मेसे लिया गया था।

आमुख में कुल 5 तरीके की स्वतंत्रता के बारेमे भी बताया गया है जैसे कि

विचार की स्वतंत्रता
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
मान्यता की स्वतंत्रता
धर्म की स्वतंत्रता
उपासना की स्वतंत्रता


और इसके अलावा आमुख में समाजवादी धर्मनिरपेक्ष और अखंडितता इन तीनो शब्दो को भी डालदिया गया।
कनैयालाल मूनशी आमुख को जन्मकुंडडी के रूप में देखते है। जबलपुर के प्रख्यात चित्रकार बेओहर राममनोहर सिन्हा ने आमुख के संविधान के पन्नो की डिजाइन तैयार की थी। एन. ए पालखी वाला जोकि एक प्रतिष्टित कायदाशास्त्री थे उन्होंने आमुख को संविधान का पहचान पत्र बताया है। पंडित ठाकुरदास भार्गव द्वारा आमुख को अबधरण का सबसे मूल्यवान अंग कहा गया है। और एन. हिदायतुल्लाह ने आमुख को USA के declaration of independence के साथ तुलना की है।

आमुख के बारेमे स्पष्टता


सन 1960 के बेरुबारी यूनियन केस के दौरान सर्वोच्च अदालत द्वारा यह प्रस्थापित किया गया की आमुख बंधारण का अंग नहीं है बल्कि बंधारण कि जोगवाई के पीछे हेतु दर्शाता है। वही सन 1973 में केसवानंद भारती केस में सर्वोच्च अदालत ने यह सुनवाई दी कि आमुख एक बंधारण का अंग है। सन 1995 के एलआईसी ऑफ इंडिया केस में भी सर्वोच्च अदालत ने आमुख को इंडिया के बंधारण का अभिन्न अंग दर्शाया है।

संविधान


संविधान एक मौलिक कायदाकिया दस्तावेज है और प्रत्येक देश का एक खुद का संविधान होता है भारत के संविधान का एक विशिष्ट महत्व है।

संविधान का इतिहास


इसका सबसे पहले उल्लेख 1919 में किया गया था उसके बाद गांधीजी ने इसको 1922 में व्यक्त किया। 24 अप्रैल 1923 को तेजबहादुर सपु की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था जिसमे कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल का मुसदा तैयार किया गया था।

संविधान रचनेका प्रथम प्रयास


संविधान बनानेका खयाल सबसे पहले गांधीजी को आया था। सं 1925 में एम. एन. रॉय ने संविधान का खयाल पेश किया। सं 1928 में संविधान के सिद्धांत को  नक्की करनेके लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक नेहरू कमिटी की स्थापना हुई। सं 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया पसार हुआ जिसका प्रभाव अभी के बंधारण में देखनेको मिलता है।

संविधान सभा रचनेकी सर्वप्रथम मांग


सभाकि सबसे पहली मांग 1934 में एम. एन. रॉय के द्वारा हुई थी। 1936 में कोंग्रेस के लखनऊ अधिवेशन  में यह प्रस्ताव जारी हुआ कि बाह्य सत्ता का कोई भी संविधान मान्य नही रहेगा। 1937 में वयस्क के मताधिकार के दम पर कांग्रेस चुनाव जित गई दिल्ली में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आधारित संविधान बनानेका प्रयास किया.

प्रावधान


भारत के लिए राज्य मुख्या रहेगा. दुसरे विश्व युद्ध के बाद संविधान की रचना होगी. सरकार खुदको नुकशान पहोचने वाली शक्ति के हाथोमें  शासन नहीं सोप सकती. कांग्रेस और मुस्लिम दोनों के द्वारा यह प्रस्ताव स्वीकारा गया था. भारतीयोकि सहभागी वाली युद्ध सलाह कार परिषद् की स्थापना की जाएगी. सभी प्रांत और देशी राजवाडा ओ का संघ बनेगा. देशी राजवाडा स्वतंत्र रह सकता है. भारत के लोगो के द्वारा चुने गए संविधान सभा भारत में संविधान की रचना करेगी.

राज गोपालाचारी फार्मूला


श्री राज गोपालाचारी के द्वारा सब 10/4/1944 में एक प्रस्ताव रखा गया जिसको गांधीजीने समर्थन दिया. मुस्लिम लीग भारत की स्वतंत्रता की मांग में समर्थन करेगा. युद्ध के बाद मुस्लिम विस्तार में जन मत के द्वारा यह पुख्ता किया जाएगा की वह भारत में रहना चाहते है या नहीं और यह ब्रिटन के द्वारा स्वतंत्रता देने के बाद ही नक्की किया जाएगा. जो देश विभाजित होता है तो ऐसी स्थिति में जरुरी विषय जैसे की संरक्षण, संचार, वाणिज्य, जैसे संबंध में दोनों देशों की बिच करार होगा. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के द्वारा इस फोर्मुले का स्वीकार हुआ.

वेवेल योजना


भारत के वाइस रॉय वेवेल 25 जून 1945 के दिन शिमला में भारतीय नेताओं का एक सम्मेलन का आयोजन हुआ. इस शिमला प्रस्ताव में लार्ड वेवेल के द्वारा एक प्रस्ताव रखा गया जिसका प्रावधान नीचे दिया गया है.


गवर्नर जनरल और सेना अध्यक्ष के अलावा सारे पद भारतीयों को दिए जाएँगे.
जबतक भारत खुद का संविधान नहीं बना लेता तब तक काम चलाऊ व्यवस्था के लिए सरकार की स्थापना होगी. जिसमे हिन्दू और मुस्लिम दोनों सामान तौर पे प्रतिनिधित्व कर पाएँगे और दलित वर्ग और सिख के लिए एक - एक प्रतिनिधि होंगे.

कैबिनेट मिशन 1946


19 फरवरी 1946 में ब्रिटन के वादाप्रधन कलेमंड एटली ने भारत के राजकीय विवाद को सुलझाने के लिए तीन सभ्य से बने हुए उच्चस्तरीय शिष्ट मंडल केबिनेट कक्षा के को भेजने की जाहेरात की गई जिसमे नीचे दिए गए लोग शामिल थे.

लार्ड पेथिक लोरेन्स
सर स्टेफर्ड क्रिप्स
A.V एलेक्जांडर
प्रावधान


ब्रिटिश भारत और देशी रजवाड़ा को एक करके अखंड भारत संघ की रचना होगी. संघ के पास तीन विभाग होंगे विदेश, रक्षा, और संचार. संविधान बनाने के लिए संविधान सभा की रचना होगी जो भारतीय के द्वारा ही होगी. संघ संबंधित मुद्दों के अलावा दूसरे मुद्दे राज्य के पास रहेंगे.

एटली की घोषणा


20 फरवरी 1947 में ब्रिटन के वादाप्रधन कलेमेन्ट एटली के द्वारा यह घोषणा की गई की लार्ड माउन्ट बेटन नए वाइस रॉय बने है और ब्रिटिश सरकार 30 जून 1948 तक भारत को सत्ता सौंप देंगे.

माउन्ट बटन योजना 3 जून 1947


कोमवादी हिंसा की वजह से माउन्ट बेटन ने भारत और पकिस्तान के हिस्से करने के मुद्दे पर कांग्रेस और मुस्लिम लिंग के नेता ओ के साथ एक योजना रखी जिस योजना को माउंट बेटन योजना कहते है. इस योजना के तहत जन मत पकिस्तान की और गया और पश्चिम बंगाल और पूर्व बंगाल भी पकिस्तान में मिल गए. 26 जुलाई 1947 के दिन माउन्ट बेटन ने पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा रचने की घोषणा की.

भारतीय स्वतंत्र अधिनियम 1947


माउन्ट बेटन की योजना पर दोनों पक्षों की सम्मति के बाद इस योजना को ब्रिटिश संसद में पास कर दिया गया. 4 जुलाई 1947 के दिन यह योजना संसद में रखी गयी. 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश सम्राट के द्वारा इस योजना को स्वीकृति मिली.

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