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The constitution of India part - 8

The constitution of India

The constitution of India part - 8
The constitution of India part - 8

संसद


अनुच्छेद - 79 के तहत राष्ट्रपति, राज्यसभा, और लोक सभा को मिलाकर संसद बनती है। राज्य सभा संसद का ऊपरी गृह है और लोक सभा संसद का नीचे का गृह है। राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है फिरभी वह संसद के सभ्य नही है और संसंद में बैठते भी नही। चार्टर एक्ट 1853 के कायदे के अनुसार भारत मे संसदीय प्रणाली की शरुआत हुई। भारतीय संसद प्रणाली ब्रिटिश संसद प्रणाली पर आधारित है। 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम के द्वारा मंत्री मंडल व्यवस्था को मंजूरी मिली। 1919 के मोनडेग्यु - चेम्सफर्ड सुधार के द्वारा केंद्रीय स्तर द्विगृहीय प्रणाली की शुरुआत 1921 में शुरुआत हुई। विट्ठलभाई पटेल 1925 में निचेके गृह के प्रथम चुनेगये भारतीय अध्यक्ष बने इस परिणाम से गुजरात विधानसभा का नाम उनके नाम पर पडा।

राज्यसभा


अनुच्छेद - 80 में जोगवाई। राज्यसभा की रचना 3 अप्रैल 1952 के दिन हुई थी। और अध्यक्ष के तौरपर सर्वपल्ली राधाकृष्ण चुने गए। राज्यसभा की प्रथम बैठक 13 मई 1952 केदिन हुई थी। 23 अगस्त 1954 में इसका नाम राज्यसभा रखा गया। राज्यसभा में सभ्यो कई संख्या ज्यादा से ज़्यादा 250 तक होनी चाहिए। अभी यह 245 है (233-12 राष्ट्रपति के द्वारा बनाया गया 233 मेसे 299 राज्यमेसे। 
नीचे दिए केन्द्रशेषित प्रदेश राज्यसभा में प्रतिनिधि नही है।

1 चंडीग
2 दीव और दमन
3 लक्षदीप
4 अंदमार और निकोबार
5 दादरा नगरहवेली

कार्यकाल

राज्यसभा को कायमी गृह कहते है जिसका विसर्जन नही होता। इनके सभ्यो के कार्यकाल 6 वर्ष और सभ्य की उम्र 30 साल।हर 2 सालोमे सभ्यो के 1/3सभ्योकि निवृति और तीसरे वर्ष की शुरुआत मे ⅓ सभ्यो की निमणुक। सभ्य सभापति को राजीनामा दे सकते है। किसी भी सभ्य के राजीनामे से या फिर मृत्यु से जगह खाली होती है तो 6 महीने में चुनाव करना पड़ता है।

चुनाव

अप्रत्यक्ष तरीकेसे राज्यसरकार द्वारा होता है।

सभापति


राज्यसभा के सभापति होद्दे की रुए उपराष्ट्रपति होते है। अगर उनके काम के बारेमे बात करे तो राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन करना संसद में कायदा बनाना और नए सभ्यो को शपथ दिलाना।

उपसभापति


राज्यसभा के सभ्यो मेसे ही उपसभापति की निमणुक होती है। वह सभापति की गैरहाजरी में उनके कार्यभार संभालते है। 14 मई 2002 के रोज़ संसद में खारड़ा पसार करके यह निर्णय लिया गया कि वाइस चैयरमेन यानी उपसभापति को राज्यक्षेत्र का दर्जा प्राप्त होगा। जब सभापति और उपसभापति दोनों की गैरहाजरी में राज्यसभा के नियम के अनुसार नियुक्त किया गया व्यक्ति राज्यसभा के कार्यभार संभालेगा।

राज्यसभा की शक्ति


राज्यसभा के दो सत्र के बीच का समय 6 महिनेसे ज़्यादा नही होना चाहिए। राज्यसभा के प्रथम सभापति डॉ राधाकृष्ण और उपसभापति एच.वी. कृष्णमूर्ति थे। केवल राज्यसभा ही राज्यपार्टी के विषयों पर कायदा बना सकती है। अखिल भारतीय सेवा का सर्जन अनुच्छेद 312 के तहत ⅔ बहुमति से कर सकते है। अखिल भारतीय सेवा तीन प्रकार की होती है

1 भारतीय वहीवट सेवा
2 भारतीय पुलिस सेवा - 1961
3 भारतीय वन सेवा - 1966

राज्यसभा नाणाबिल के मामलेमे मात्र सुचना दे सकती है जिसको लोकसभा मानने के लिए बंधित नहीं है. जो 14 दिन में नाणाबिल राज्यसभा मेसे लोकसभा में भेजा नहीं जाता तो वह पसार हुआ माना जाता है. अगर कोई सभ्य 60 दिनों तक सभा मेसे गैरहाजर रहे तो उसका सभ्य पद रद्द हो सकता है. राज्यसभा की गुजरात की सिट 11 है. राज्यसभा में सबसे ज्यादा उत्तरप्रदेश की सिट है जोकि 31 है.

लोकसभा 


अनुच्छेद - 81 के तहत जोगवाई. यह संसद का प्रथम और नीचेवाला गृह होता है. यह लोकसभा का प्रतिनिधित्व गृह है. लोकसभा की रचना - 17 अप्रेल 1952 को हुई थी. और प्रथम बैठक 13 मई 1952 को हुई थी. नामकरण 1954 में लोकसभा तय किया गया. लोकसभा की सभ्य संख्या ज्यादा से ज्यादा 552 होगी और वर्त्तमान में 545 है. 2 अग्नो इंडियन सभ्य की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा अनुच्छेद 331 के तहत होती है. जिसमे (माता - भारतीय, पिता - यूरोपियन) होते है. लोक सभा में मूल संविधान में संख्या 500 थी. 31 वे सुधार के तहत संख्या 547 हुई थी. 1987 में गोवा, दिव, दमन सभ्य संख्या बढ़के 552 की गयी थी. जिसमे 530 सभ्यों राज्य मेसे और 20 सभ्यों केन्द्रशाषित प्रदेश मेसे और 2 सभ्यों राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्त किये जाते है. 84 वे सुधार 2001 के तहत यह तय हुआ की 25 वर्ष तक यानी की 2026 तक सभ्य संख्या यथावत राखी जाएगी. सभ्यों का कार्यकाल 5 साल का होता है और सभ्यों की उम्र 25 साल होनी चाहिए और सभ्य भारत का नागरिक होना चाहिए. और कटोकटी के समय पर इसे एक साल और बढाया जा सकता है. विसर्जन के बाद 6 महीने में चुनाव करना पड़ता है. 

शपथ

लोकसभा के सभ्य राष्ट्रपति के समक्ष यतो उनके द्वारा चुने गए व्यक्ति के सामने शपथ ग्रहण करेंगे. अगर कोई व्यक्ति लोकसभा का सभ्य नहीं है और उसके बावजूद भी वह सभा में रहता है तो प्रत्येक दिन का 500 दंड के रुपमे सुको देना पड़ेगा.

चुनाव और अन्य विगत

लोकसभा के लिए प्रत्येक 5 साल में पुख्त मतदार के द्वारा गुप्त मतदान होता है. लोकसभा का सत्र राष्ट्रपति के द्वारा नियत समय पर बुलाया जाता है और स्थगित भी किया जाता है. दो सत्र के बिच का समय 6 महीने से ज्यादा नहीं होना चाहिए यानी साल में 2 सत्र होने चाहिए. किन्तु सामान्य तौर पर वर्ष में 3 बार सत्र का आयोजन किया जाता है. 

लोकसभा स्पीकर 


अनुच्छेद - 93 के तहत चुनाव के बाद लोकसभा की प्रथम बैठक में लोकसभा उनके सभ्यों मेसे किन्ही एक सभ्य को स्पीकर और एक सभ्य को डिप्टी स्पीकर के तौर पर नियुक्त करते है. अगर बात करे स्पीकर के कार्य की तो स्पीकर को लोकसभा की कामगिरी का संचालन करना होता ह। सभ्यो को प्रस्ताव रखनेकी और भाषण देने की अनुमति देनी होती है। लोकसभा में पेश किया गया खारड़ा नाणाकिय है या नही यह स्पीकर तय करता है। स्पीकर लोकसभा के अध्यक्ष के तौरपत नही बल्कि सामान्य सभ्य के तौरपर सपथ लेते है। किसी कारण से लोकसभा का भंग होताहै फिर भी नई लोकसभा की प्रथम बैठक तक स्पीकर पद रहता है। लोकसभा की सभी संसदीय समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति उनके कार्य लोकसभा के अध्यक्ष पक्ष तय करते है। दसवीं अनुरूचि के तहत पक्ष - पलटा विरोधी कानून के आधार पर कोई भी सभ्य का सभ्य पद का अंतिम निर्णय अध्यक्ष पक्ष के आधीन होता है। यदि लोकसभा में गण संख्या का अभाव 1/10 होता है तब लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर सकते है। जब किसी भी खारड़ा की अंतर्गत मतदान में दोनों पक्ष में एक जैसे मत आते है तब स्पीकर निर्णायक मत देते है। स्पीकर डेपुटी स्पीकर को और डेपुटी स्पीकर स्पीकर को यानी दोनों एक दूसरे को राजीनामा देते है। स्पीकर या डेपुटी स्पीकर को 14 दिन की नोटिस देनेके बाद गृह सभ्यो की बहुमति से ठहराव पसार करके उसे उसके पद से हटाया जा सकता है। संसद की सैयुक्त बैठक का संचालन स्पीकर के द्वारा होता है। स्पीकर की गैरहाजरी में डेपुटी स्पीकर कार्यभार संभालते है लेकिन दोनों की गैरहाजरी में राष्ट्रपति 6 सभ्यो की पैनल मेसे किसी भी एक व्यक्ति की नियुक्ति करते है। 10 वी लोकसभा तक अध्यपक्ष और उपाध्यक्ष सत्ताधारी पक्ष के ही होते थे परंतु 11 वी लोकसभा से अध्यपक्ष सत्ताधारी पक्ष के और उपाध्यक्ष विरोधी पक्ष के दोनों के थे। प्रथम अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावडंकर और प्रथम उपाध्यक्ष एम. एन. आयंगर थे। 5 वी लोकसभा सबसे लंबे समय तक रही थी और 2 बार उसका कार्यकाल 2 साल तक लंबा चला था। 12 वी लोकसभा का समय सबसे कम था वह सिर्फ 13 महीने था। 42 वे सुधार 1976 में यह तय हुआ कि लोकसभा का कार्यभार 6 साल होगा परंतु 44 वे सुधार 1976 के द्वारा 6 साल से कम करके 5 साल किया। वर्तमान में 17 वी लोकसभा शुरु है। गुजरात के लोक सभा की सीट - 26 है सबसे ज़्यादा सीटे उत्तरप्रदेश में है - 80।

प्रोटेम स्पीकर


राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की जाती है और वरिष्ठ संसद का चुनाव होता है। प्रोटेम स्पीकर का काम स्पीकर का चुनाव करना लोक सभा के सभ्यो की सपथ। 16 वी लोकसभा का प्रोटेम स्पीकर कमल नाथ थे।

संसद के महत्वपूर्ण मुद्दे


सभाका कार्य कायदाकिया रूपसे करने के लिए कम से कम सभ्यों की हाजरी को कोरम कहते है. कुल सभ्य संख्या 1/10 कोरम कहलाती है. लोकसभा के 55 सभ्यों और राज्य सभा के 25 सभ्यों को कोरम कहा जाता है. संसद की भाषा हिंदी और इंग्लिश है. संसद सभ्यों के विशेष अधिकार अनुच्छेद 105 के तहत है. गृह की कार्यवाही के दरम्यान सभ्य ने किया हुआ निवेदन के मामलेमे अदालात की कार्यवाही नहीं हो सकती. अगर कोई भी सभ्य्स सभा में एक साथ 60 दिनों तक हाज़िर न रहे तो उसका सभ्य पद रद्द हो जाता है. गृह की बैठक के आगे पीछे के 40 दिन के समय के दरमियान कोई भी सभ्य की दीवानी केस में धरपकड़ नहीं की जा सकती. किन्तु फोजदारी तथा अट्कायत धरा संबंध में अध्यक्ष को जान करके सभ्य की धरपकड़ हो सकती है.

विरोधी पक्ष के नेता


इसके लिए मूल संविधान में कोई भी जोगवाई नहीं है. 1947 से विरोध पक्ष के नेता को कायदाकीय मान्यता मिली. उनका दर्ज़ा केबिनेट प्रधान समकक्ष गिनाजाता है. उनका अस्तित्व संसद के दोनों गृह में है. गृह का शासक पक्ष के सिवाय दूसरा सबसे बड़ा पक्ष के जिनकी सभ्य संख्या गृह की कुल सभ्य संख्या की 1/10 से कम न हो उस पक्ष को विरोध पक्ष कहा जाता है. 

संसद की सैयुक्त बैठक


अनुच्छेद 108 के तहत जोगवाई. सैयुक्त बैठक राष्ट्रपति के द्वारा निचे दिए गए कुछ संजोग में बुलाई जाती है. जब कोई एक गृह मेसे पसार हुआ खरडा कोई दुसरे गृह के द्वारा अस्वीकार हुआ हो. किसी भी खरडा के मुद्दे पे दोनों गृह में मतभेद हो. एक गृह मेसे पसार हुए खरडे को दुसरे गृह में 6 माहिने से अधिक समय लग गया हो. संसद की सैयुक्त बैठक का संचालन लोकसभा के स्पीकर द्वारा होता है. संविधानीय सुधार या नाणाकिय खरडा के मुद्दे पर संसद की सैयुक बैठक की कोई भी जोगवाई नहीं है. जो खरडा दोनों गृह मेसे अलग अलग पसार होने चाहिए. अभीतक संसद की बैठक तीन बार बुलाई गयी है.

1 दहेज़ विरोधी अधिनियम - 1961
2 बैंकिंग सेवा अर्पण - 1977
3 आतंकवाद विरोधी विध्रयक - 2002

इन तीनो बैठक में हाजिर रहने वाले एक मात्र सांसद अटलबिहारी वाजपेयी थे. 

नाणाखरडा


अनुच्छेद 110 के तहत जोगवाई. जारी किया गया नाणाबिल है के नहीं यह यह लोकसभा के स्पीकर तय करते है। नाणाबिल सिर्फ लोक सभा मे ही पेश किया जाता है। नाणाबिल को पेश करने से पहले राष्ट्रपति की इजाज़त लेना आवश्यक है। राष्ट्रपति नाणा खारड़ा को पुनः विचार के लिए वापास नही भेज सकते। नाणाखारड़ा लोकसभा मेसे पसार करके राज्य सभा मे भेजा जाता है जिसके ऊपर राज्यसभा ज़रूरी सुधार करके लोकसभा को वापिस भेजता है किंतु वह सुधार मानने के लिए लोकसभा बंधित नही है अगकर राज्यसभा 14 दिन में नाणा खारड़ा पसार करके लोकसभा में नही देती है तो वह खारड़ा पसार किया हुआ माना जाता है और उस खरडे को राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है। और राष्ट्रपति उस पर दस्तखत करे उसके बाद ही खारड़ा उसपर कायदे का स्वरूप धारण करता है। हर एक नाणा खारड़ा नानकीय है किंतु हर एक नानकीय खारड़ा नाणाखारड़ा नही भी हो सकता। अनुच्छेद 117 के तहत नाणाकिय खारड़ा की खास कार्यवाही की जोगवाई दर्शाई गई है।
कर माड़खा की जोगवाई
नाणा उधार लेनेकेलिये और देनेकेलिये
सचित नीति के संबंध में।

वार्षिक नाणाकिय निवेदन

संविधान में अन्दाजपत्र ऐसे किसी शब्द का उपयोग नही है। किंतु अनुच्छेद 112 के तहत वार्षिक नाणाकिय निवेदन के तहत जाना जाता है। बजेट आनेवाले नाणाकिय साल के दरमियान अन्दाजीत आमदनी और खर्चा दिखाता हिसाबी पत्रक है। जिस राष्ट्रपति की औरसे न नाणामंत्री संसद में पेश करते है। 1921 से केंद्रीय बजेट और रेलवे बजेट अलग अलग पेश होते थे लेकिन 2017 से दोनों बजेट एक साथ ही पेश होता है। 

संसद के सत्रो


संसद के एक सालमे तीन सत्रो होते हैं।

1 बजेट सत्र
2 सावन का सत्र
3 सर्दी का सत्र

1 बजेट सत्र

यह सत्र सबसे लंबा सत्र होता है क्योंकि इसकी शुरुआत फरवरी से होती है और अंत मई में होती है और इस सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के भाषण के द्वारा होती है।

2 सावन सत्र

जुलाई से सितंबर में संसद का सामान्य काम चलता है।

3 सर्दी का सत्र

यह सत्र नवम्बर से दिसंबर तक चलता है और संसद का सबसे छोटा सत्र है। दो सत्रों के बीच कमसे कम 6 महीने का समय होता है।

खारडा


खारड़ा का मुख्य 3 प्रकार है।

1. सामान्य खारडा
2. नाणाकिय खारडा
3. संविधानिय खारडा

1 सामान्य खरडा

जिसकी पेशकश संसद के किसीभी गृह में हो सके. यह सामान्य बहुमति से पसार होता है. इसमें भी राष्ट्रपति की सत्ता होती है. अगर राष्ट्रपति चाहे तो इस खरडे को हां या ना भी कह सकते है और इसपर पुनः विचार करने के लिए भी भेज सकते है. पुनः विचार के लिए भेजा हुआ खरडा जब पुनः संसद के द्वारा राष्ट्रपति को भेजा जाता है तो राष्ट्रपति को उसे मंजूरी देनी पड़ती है. एक सामान्य खरडा के लिए भी संसंद की सैयुक्त बैठक को बुलाया जा सकता है. सैयुक बैठक बुलाने की सत्ता राष्ट्रपति के पास है.

2 नाणाकिय खरडा

जिसकी रजुआत फ़क्त लोकसभा में ही हो सकती है. लोकसभा मेसे बहुमति में पसार होने के बाद राज्यसभा में भेजा जाता है. राज्यसभा को 14 दिनों में कोई भी निर्णय लेना अनिवार्य है अगर राज्य सभा कोई निर्णय नहीं लेती तो उस खरडा को पास हुआ माना जाता है. अगर राष्ट्रपति चाहे तो इसे हा या ना कर सकते है. नाणाखरडा राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से हुआ होता है इसी लिए राष्ट्रपति उसे वापिस नहीं भेजते और सामान्य तौरपे राष्ट्रपति मंजूरी दे देते है.

3 संविधानिय खरडा

अनुच्छेद - 368 के तहत संविधान में सुधार हो सकता है इसकी जोगवाई दक्षिण अफ्रीका मेसे हुई है. इसकी शुरुआत संसद के किसीभी गृह मेसे हो सकती है. खरडा के प्रकार के हिसाब से इसमें विशेष बहुमति होती है 50% राज्यों की मंजूरी. इस खरडा के मुद्दे पर पूरी बैठक नहीं बुलाई जा सकती. इस खरडा के लिए दोनों गृह में अलग अलग पसार होना ज़रूरी है. संविधान में सुधार करने की प्रक्रिया राष्ट्रस्तर पर कभी शरू नहीं हो सकती. राष्ट्रपति के वट हुकुम के द्वारा संविधान में सुधार नहीं हो सकता. राष्ट्रपति को इस खरडा में फक्त हां ही कहना होता है. 

खारडा पढ़ना

किसीभी प्रकार का खारडा किसी एक गृह में तीन पढनेकी प्रकिया मेसे पसार होता है।

प्रथम पढ़ाई - इस भाग में फक्त खारडा की पेशकश होगी। इसमें कोई भी चर्चा या सुधार नही होगा।

दुसरी पढ़ाई - इसमें संसदीय समिति बनाके खारडा को सोपा जाता है। इसमें चर्चा और सुधार शक्य है। गृह के संचालक मतदान की घोषणा करते है।

तीसरी पढ़ाई - इसमें मतदान की प्रक्रिया होगी। इसमें चर्चा और सुधार नही होगा।

संसदीय समिति


स्थायी स्थिति हरसाल या नियत समय मे गठित होती है। वर्तमान में 45 जितनी समिति है। स्पीकर और चैयरमेन के द्वारा सभ्यो की नियुक्ति होती है। हर एक समिति खुदके रिपोर्ट स्पीकर या चैयरमेन को देते है। समिति को कार्य करनेकी सारी सुविधा संसद के सचिवालय के द्वारा पूरी होती है। 

समिति के प्रकार

1 गठन के आधारपर
2 कार्यकाल के आधारपर

1 गठन के आधार पर - एक ग्रहीय समिति, सैयुक्त समिति जिसका अध्यक्ष लोकसभा का सभ्य होगा.

2 कार्यकाल के आधार पर - 1 एडहोक समिति - किसी भी प्रकार के खरडा पर चर्चा विचारना करनेके लिए. जिसका समय निश्चित होता है. 2 स्थायी समिति - किसीभी नियत प्रकार के रिपोर्ट को झंचनेके लिए. जिसका समय 1 साल का होता है. 

महत्वपूर्ण  समिति

1 जाहेर हिसाब की समिति

यह सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण समिति है इसकी शुरुआत 1921 में हुई थी. यह एक स्थायी और सैयुक्त समिति है. 1924 से राज्यसभा के सभ्यों का समावेश हुआ है. इस समिति के कुल सभ्य इस प्रकार है ( जिसमे लोकसभा के सभ्य - 15 और राज्यसभा के सभ्य - 7 है. इसकी रचना हर साल होती है. नाणामंत्री इस का सभ्य नहीं बन सकता. 1967 से विरोधी पक्ष के कोई सभ्य को ही अध्यक्ष बनाया जाता है. इस समिति का मुख्य कार्य राष्ट्रपति के द्वारा संसद में पेश की या हुआ CAG के अहवाल पर चर्चा विचारणा और उसकी समीक्षा करना.

2  अंदाज समिति

इसकी शरुआत सन 1950 में जॉनमथाई समिति की विनंती से हुई थी. यह एक ग्रुहिय समिति है. इस समिति के कुल सभ्य 30 होते है और सभी सभ्य लोकसभा के ही होते है. इसकी रचना हर साल की जाती है. इसकी अध्यक्ष की नियुक्ति स्पीकर के द्वारा होती है. इसमें कोई भी मंत्री सभ्य नहीं बन सकता. यह संसद की सबसे बड़ी समिति है. इसको तीसरे गृह का दर्ज़ा प्राप्त है. अगर इसके मुख कार्य की बात करे तो बजेट के आलावा अलग अलग अंदाज़ और अर्थतंत्र की अलग अलग निति की सलाह और समीक्षा करना.

3 जाहेर सलाह समिति

इस समिति की रचना 1964 में कृष्णा मेनन समिति की बिनती से हुई है. इस समिति की मुद्दत 1 साल की होती है. इस समिति के सभ्याकी बात करे तो इस समिति में २२ सभ्य होते है 1974 से पहले सभ्य की संख्या 15 थी और इन सभ्यों मेसे 15 लोकसभा के सभ्य और 7 राज्यसभा के सभ्य थे. इस समिति का कार्य जाहेर साहस के हिसाब को चेक करना और CAG के द्वारा जाहेर किये गए साहस के अहवाल को चेक करना है. इस समिति में भी अध्यक्ष की नियुक्ति स्पीकर के द्वारा होती है और यह लोकसभा के सभ्यों मेसे ही कोई एक होता है. और कोई भी मंत्री इस समिति का सभ्य नहीं बन सकता है.

4 प्रवर समिति

लोकसभा या राज्यसभा के लिए अलग अलग या सैयुक्त भी हो सकता है. एक गृही हो तो इसकी सभ्य संख्या 30 होती है. अगर द्विग्रुही हो तो इसकी सभ्य संख्या 45 होती है (30 + 15)। इस समिति का कार्य कायदा पे चर्चा करना होता है।

सांसदों के सभ्य पद


अगर किसी राज्य का धारासभ्य किसी संसद में सभ्यपद प्राप्त करता है तो उसको 14 दिन में धारासभा का पद छोड़ना होता है अगर वो ऐसा नही करते तो संसद का पद खाली ही गिना जाएगा। अगर कोई सभ्य एक गृह का हो और दूसरे गृह में सभ्यपद प्राप्त करता है पहले गृह का सभ्यपद रद हो जाता है। अगर कोई व्यक्ति एक साथ कोईभी एक गृह में एक के अलावा ज़्यादा सीट से जीता हो तो उसको 10 दिनों में उसका चुनाव पेश करना होता है वरना राज्यसभा सीट खाली करनी पड़ती है।

संसद के शब्दों का अर्थ घटन


एटर्नी जनरल - जिसकी जोगवाई अनुच्छेद - 76 में की गई है। इन की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वार होती है। और अगर वह पैड छोड़ना चाहता है तो उसका इस्तीफा भी राष्ट्रपति को ही देना होता है। इस पद का समय राष्ट्रपति टी इच्छा अनुसार होता है या 65 साल की उम्र तक होता है। यह केंद्र सरकार के कानूनी सलाहकार माने जाते है और जिनको केबिनेट जैसा ही दर्ज़ा और सत्ता मिलती है। अगर हम इन की लायकात के बारेमे बात करे तो वडी अदालत में 5 साल या उससे ज़्यादा समय न्यायाधीश के तौरपर या 10 साल का वाक़िलात का अनुभव। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी लायकात। देशके प्रथम कायदा अधिकारी और उनके कार्य इस प्रकार होते है। राष्ट्रपति के द्वारा सोपा गया कायदा विषयक कार्य अयर भारत सरकार को कायदा के मुद्दे पर सलाह देना। कलम 88 के तहत देश की किसीभी अदालत में सुनवाई कर सकते है। संसद के सभ्य ना होने के बावजूद संसद सभा मे भाग ले सकते है पर मतदान नही कर सकते। अभी के एटर्नी जनरल वेणुगोपाल है।

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक


इनकी नियुक्ति अनुच्छेद 148 के तहत राष्ट्रपति के द्वारा होती है। इनकी मुद्दत - 6 साल या 65 साल की उम्र इन दोनों मेसे जो भी पहले हो तब तक होती है। CAG जाहेर नाणा के संरक्षण की तरह कार्य करता है। नागरिको के धन का संरक्षण करते है। अगर इनको इस्तीफा देना है तो यह राष्ट्रपति को देते है। इनका कार्य इस प्रकार है। केंद्रसरकार, राज्यसरकार या स्थानिक स्वराज के एकम के हिसाब का एडिटिंग करना। खुदका रिपोर्ट राष्ट्रपति को सोपा जाएगा बाद में राष्ट्रपति गृह के समक्ष पेश करते है। संसद के दोनों गृह की प्रक्रिया में भाग ले सकते है। सरकार के CA के तौरपे भी इनको जाना जाता है। जाहेर हिसाब समिति की प्रक्रिया में भाग ले सकते है। प्रथम CAG - वी. नरहरि राव और अभी के राजीव महर्षि है। संचितनिधि के संरक्षण - संसद और आकस्मिकनिधि के संरक्षक - राष्ट्रपति है। लोगोके धन का संरक्षक - CAG है।

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