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History of Gujarat

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History of Gujarat
History of Gujarat

जैसा की आप सब जानते है की इंडिया में ना जाने कितने ही राजाओ ने शाशन किया है और इसी वजहसे इंडिया का इतिहास बहोत ही बड़ा है इसी प्रकार गुजरात का इतिहास भी बहोत बड़ा है तो चलिए शुरू करते है history of gujarat

डायनासोर काल


गुजरात के इतिहास की शरुआत डायनासोर युग से हुई है क्योकि गुजरात के महिसागर जिल्लेके बालासिनोर तालुकाके रैयाली गाउ में डायनासोर के अंडे मिले थे. और ऐसा माना जा रहा है की यह अंडे करीब 6 या 6.50 करोड़ वर्ष पुराने है.

क्योकि इस जगह से डायनासोर के अंडे मिले थे इसी लिए गुजरात सर्कार ने इस जगहपर डायनासोर पार्क बना दिया है की सभ्यता 

सिन्धुघाटी सभ्यता


सिन्धुघाटी की सभ्यता इसा पूर्व 2500-1750 तक गुजरात में फलफूल रही थी. वैसे सिन्धुघटी की सभ्यता सिर्फ हमारे इंडिया में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी पायी जाती है.

रंगपुर


रंगपुर गुजरात मेसे मिला सबसे पहला नगर था. रंगपुर गुजरात के सुरेंद्रनगर जिल्लेके लिंबडी तालुकामे भादर नदीके किनारे बसा नगर था. रंगपुर की शोध सन 1931 में माधव स्वरुप वत्स ने की थी. इस नगर में कच्ची इटो का बना एक किल्ला मिला है.मित्तिके बर्तन, हाथी दन्त से बनी चीज़े, मिटटी के बर्तन, स्नान गृह भी मिले है और इस नगर की खु बी यह थी की इस नगर में रास्ते बहोत ही अच्छी तरह से आयोजन करके बनाए गए थे.

लोथल


लोथल अमदावाद जिल्लेके धोड़का तालुका के साबरमती और भोगावो नदी के बिचमे बसा नगर है. लोथल का मतलब होता है मरे हुए का टीला. इस नगर का उत्खनन एस आर राव के द्वारा 1955 में किया गया. लोथल में सिन्धुघटी का सबसे बड़ा बन्दर है. लोथल की नगर रचना बहोत ही अद्भुत थी क्योकि लोथल में सारे माकन एक लाइन में और रास्ते बहोत ही बड़े और एक दुसरे को छोर पे मिलते थे. लोथक के रास्ते इतने ज्यादा बड़े थे की इसपर से दो वाहन एक साथ निकल सकते थे. 

लोथल में जो भी बड़े घर हुआ करते थे वहा पर कुवा भी हुआ करता था. और हर एक माकन में से गंदे पानी को निकल नेकी व्यवस्था भी थी. लोथल में ह्हथियर और गहने बनानेकी भट्ठी भी मिली. मिटटी के खिलोने और बर्तन भी मिले. लोथल मेसे कुल 21 कंकाल मिले जिसमेसे एक कंकाल की खोपड़ी में छेद था जोकि यहाके शस्त्र क्रिया का सूचक है. उसके आलावा यहापे एक ऐसा खेल मिला है जोकि शतरंज से मिलता है. लोथल में जब कोई मर जाता था तो उसके शव को ज़मीं में दफ़न कर दिया जाता था. उसके आलावा यहासे अनाज पिसने की चक्की, नाव की आकृति वाली मुद्रा और घोदेका एक खिलौना भी मिला है जोकि टेराकोटा से बना हुआ है.

धोडाविरा


धोडाविरा कच्छ जिल्लेमे भचाऊ तालुका की लूणी नदी के किनारे बसा शहर था. और यह नगर सिन्धुघाटी सभ्यता का सबसे बड़ा नगर है. इस का उत्खनन आर एस विस्ट द्वारा 1990-1991 में किया गया है. धोडाविरा मुख्या 3 भागोंमे बटा हुआ है.


  • शाशक और अधिकारी का गढ़
  • ऊपर का नगर जिसमे अन्य अधिकारियो का आवास है
  • निचे का नगर जिसमे सामान्य नागरिक रहते थे.

धोडाविरा में धातु छानने की भट्ठी, हथियार बनाने के लिए अलग अलग साधन भी मिले है, खेलने का मैदान मिला है, जब भूकंप में चौकोर मकान गिर जाते थे तब उसको गोल बनाया जाता था, यहां पर एक बड़ा स्नानागार भी था, मिले हुए अवशेष पर से यह लग रहा है कि यह एक व्यापार का केंद्र था यहां पर तालाब कुएँ और पानी की टंकी या भी मौजूद थी और विश्व का सबसे पहला साइन बोर्ड यहां पर ही मिला था.

रोजड़ी


रोजड़ी राजकोट जिला के गोंडल तालुका में भादर नदी के किनारे बसा हुआ नगर था यहां पर लोग भूरे कलर की मिट्टी के बर्तन का उपयोग करते थे यहां पर थोड़ी ईटो के और बाकी के मिट्टी के मकान देखने को मिलते हैं.

गुजरात में खोजे गए अन्य नगर



  • देशडपर: (कच्छ)
  • केतासी: (मोरबी)
  • सुरकोटडा: (कच्छ)
  • सोमनाथ: (गिर सोमनाथ)
  • लाखाबावड: (जामनगर)
  • अमरा: (जामनगर)
  • कोट और पेढामनी: (महेसाणा)
  • किमतवाड: (सूरत)


पौराणिक काल


जिस काल का उल्लेख पुराण में किया गया हो उसे पौराणिक इतिहास कहते है। और भारत मे यह पौराणिक इतिहास मनु के पुत्र शर्याति से शुरू हुआ था। शर्याति के पुत्र का नाम आनर्त था जिसने अपने राज्य का विस्तार उत्तर गुजरात और सौराष्ट्र में किया था। और जिस जगह पर आनर्त का राज्य था वह जगह आनर्त और चमत्कार पुर के नाम से जाना जाता था। आनर्त के पुत्र का नाम रैवत था और रैवत के समय मे उसकी राजधानी कुस्थली थी जिसे हम द्वारका के नाम से भी जानते है। रैवत के समय मे यादवों ने जरासंध और शिशु पाल से तंग आकर मथुरा छोड़ दिया और सौराष्ट्र में आ गए जहाँ पर रैवत का राज था। अब सौराष्ट्र में यादवों और रैवत के बीच युद्ध हुआ और जिसमे यादवों का विजय हुआ और फिर यादवों ने रैवत की बहन रैवती की शादी श्री कृष्णा के भाई बलराम से करवा दी।

मौर्य वंश


1. चंद्रगुप्त मौर्य


इस काल का पहला राजा चंद्रगुप्त मौर्य था और उनके गुरु का नाम गुरु कौटिल्य था और हम मे से ज़्यादातर लोग उन्हें चाणक्य के नाम से जानते है। चाणक्य ने अर्थ शास्त्र की रचना की थी।

चंद्रगुप्त मौर्य के समय मे उनकी राजधानी गिरि नगर जिसको आज हम जूनागढ़ के नाम से जानते है। और भूतकाल में जूनागढ़ के कई नाम थे जैसे कि रैवत, उज्यत, वडनगर वग़ैरा। चंद्रगुप्त मौर्य के एक प्रांतीय शाशक थे जिनका नाम पुष्यगुप्त था। पुष्यगुप्त ने खेतो की सिचाई के लिए राजधानी गिरिनगर की सुवर्णसिकता और पलाशिनी नदी पर सुदर्शन तालाब का निर्माण करवाया।

2. बिंदुसार


बिंदुसार ने अपने जीवन काल के दौरान 25 साल राज किया और इसी बीच उन्होंने 16 नए नगर भी जीते।

3. अशोक


अशोक मौर्य वंश के प्रचलित राजा थे। अशोक के समय मे भी उनकी राजधानी गिरिनगर ही थी। और उन्होंने 3.6 मीटर उचाई और 22.86 मीटर चौड़ा शिलालेख बनवाया था। इस शिलालेख को पढने की कोशिश जेम्सप्रिन्सेप और भगवान लाल इंद्रजीत ने की है।

अशोक के सौराष्ट्र के शासक का नाम तुषास्प था उन्होंने खेतो के लिए सुदर्शन तालाब से सिचाई के लिए नहर निकाली थी।

4. बृहद्रथ


मौर्य वंश का यह आखरी राजा था जिकी हत्या पुष्यमित्रशृंग ने की थी।

शक क्षत्रप / अनुमौर्य वंश


1. रुद्रदामा


 रुद्रदामा को महाक्षत्रप कहा गया है। और उन्होंने अशोक के शिलालेख के पास अपना शिलालेख संस्कृत में बनवाया था इस राजा की राजधानी उज्जैन थी। और यह राजा शैवधर्मी थे।

रुद्रदामा के समय उनके सौराष्ट्र के शासक का नाम विशाखादत था। और उन्होंने टूटे हुए सुदर्शन तालाब को ठीक करवाया

2. रुद्रसिह - 3


अनुमौर्य काल का यह आखरी राजा था जिसकी हत्या चंद्रगुप्त - 2 ने की थी.

गुप्त वंश


गुप्त वंश को भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता है. गुप्त वंश का राजकीय चिन्ह गरुड़ था. गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त - 2 थे जिनको हम विक्रमादित्य के नाम से भी जानते है. गुप्त वंश में भी राजधानी गिरिनगर ही थी. गुप्त वंश का धर्म था वैष्णव धर्म.

स्कंदगुप्त


स्कंदगुप्त के उस समय के गवर्नर का नाम पर्णदत था। और जब जूनागढ़ का सुदर्शन तालाब टूट गया था तब पर्णदत ने उसका दोबारा निर्माण करवाया था। स्कंदगुप्त ने भी सम्राट अशोक की तरह अपना एक शिलालेख बनवाया था जो उन्होंने अशोक के शिलालेख के बगल मे ही बनवाया था। पर्णदत का एक पुत्र था जिसका नाम चक्रपाली था उन्होंने सुदर्शन तालाब के किनारे एक चक्रधारी विष्णु मंदिर बनवाया था। इस वंश के दरम्यान वैष्णव धर्म का प्रचार हुआ था।

मैत्रक वंश


विजयान भट्टार्क


विजयान भट्टार्क को गुप्त वंश का भी कहा जा सकता है क्योंकि वह पहले गुप्त वंश के गवर्नर थे। जब गुप्तवंश कमज़ोर हो गया था तब विजयान भट्टार्क ने राज गद्दी संभाली। गुजरात में उन्होंने एक स्वतंत्र राजा के रूपमे शासन की स्थापना की थी। विजयान भट्टार्क ने राजधानी गिरिनगर से बदलकर वल्लभीपुर करदी थी। इस वंश का कुल धर्म शैव था।

2. ध्रुवसेन - 1


यह राजा शिव भक्त थे और शिव भक्त होते हुए भी उन्होंने अपने पाटनगर वल्लभी में जैन धर्म की दूसरी संगिनी का आयोजन किया था।

3. गृहसेन


उसके समय मे मैत्रक वंश की सत्ता आनर्त प्रदेश तक फैली हुई थी इस लिए उनको प्रतापी राजा माना जाता है।

4. शिलादित्य - 1


शिलादित्य भी एक प्रतापी राजा था और उसके समय मे भी उसका साम्राज्य माडवा तक फैला हुआ था। उसको के पदवी भी मिली हुई थी जैसे कि धर्मादित्य। यह राजा हर साल एक मोक्ष परिषद का आयोजन करता था और वहा द्रव दान करता था। उन्होंने बहुत से बौद्ध विहार और देवालय बनवाए थे।

5. ध्रुवसेन - 2


इनके समय मे चीनी यात्राडु ह्यू एन त्सांग इ.स 640 में वल्लभी की मुलाकात ली थी। और इस राजा थानेश्वर सम्राट हर्ष का समकालीन माना जाता है।

6. घरसेन - 4


यह राजा बहुत ही सामर्थ्य वान और बहुत ही प्रचलित और लोकप्रिय राजा थे। और इन्हें परम भट्टार्क, महाराजाधिराज, और परमेश्वर जैसे बिरुद मिले है।

7. शिलादित्य - 7


इस राजा का पतन और राज्य का पतन एक दंत कथा के अनुसार इ.स 788 में काकूवाणिया नामक एक व्यक्ति ने अरब के सेनापति उमर बिन जमाल और अरब के राजा हमीम को राज्य पे आक्रम करने पर प्रेरित किया और इसी वजह से वल्लभी का नाश हो गया। वल्लभी नालंदा की तरह एक बड़ी विद्यापीठ थी और वह बुद्ध धर्म का एक महत्व का केंद्र था। यह राजा मैत्रक वंश के आख़िरी राजा थे।

चावड़ा वंश


चावड़ा वंश से लेकर जब तक इतिहास पूरा नहीं होजाता तब तक राजधानी पाटण ही रहेगी. 

1. वनराज चावड़ा


वनराज चावड़ा एक बहोत ही पराक्रमी रजा थे और चावड़ा वंश के स्थापक भी वही थे. उनके पिता ने हारा हुआ राज्य वनराज चावड़ा ने राष्ट्रकूट के राजा भूवड को हरा के वापस जीता था। और उनके मित्र अणहिल की याद में उन्होंने अणहिलपुर नामक नगर बसाया था जिसको आज हम पाटण के नाम से जानते है। उनका एक और मित्र था जिसका नाम चापा था और उसकी याद में वनराज चावड़ा ने चापानेर नगर बसाया था।

ययोगराज चावड़ा


योगराज उनके नाम के हिसाब से ही योगी और न्याय प्रिय थे। इनका एक पुत्र था जिसका नाम क्षेमराज था उन्होंने खंभात में एक जहाज को लूटा था इसलिए उनके पिता को उससे बहुत दुख हुआ और वह उस दुख को सहन नही कर पाए और उनकी मृत्यु हो गई।

3. सामंतसिंह चावड़ा


चावड़ा वंश का आखरी राजा सामंत सिंह था। उनकी हत्या उनके भांजे ने की जिनका नाम मूडराज सोलंकी था. और इसी के साथ इस वंश का नाश हुआ.

सोलंकी वंस


मुडराज सोलंकी


यह राजा सोलंकी वंश के पहले राजा थे. इस राजा ने सौराष्ट्र के राजा ग्र्हरियु और लाट प्रदेश के राजा को हराकर उनका राज्य लाट प्रदेश तक पहोचाया था. और इसी राजा के समय में गुज्जर प्रदेश का नाम गुजरात पड़ा था ऐसा माना जाता है. और मुडराज सोलंकी ने सरस्वती नदी के किनारे रूद्रमहाल बनानेकी शुरुआत की थी. क्योकि यह राजा ब्राह्मण को बहोत ही मानता था इस लिए इस राजा के समय में बौध धर्मं कम हो गया था. और इस राजा ने गुजरात और सौराष्ट्र दोनों प्रदेश में खुदका ज़ंडा लेहेराया था. वृधावस्था में सरस्वती नदी के किनारे उन्होंने देह त्याग किया था.

चामुंडाराज 


चामुंडाराज सोलंकी मुडराज सोलंकी के पुत्र थे. उन्होंने धारानगरी के राजा को हराया था. यह राजा विलाशी था इसीलिए उनको पद्भ्रष्ट किया गया था और उनकी जगह उनके बड़े पुत्र वल्लभराज को गद्दी पर बिठाया गया लेकिन किसी कारन से उनके बड़े पुत्र का देहांत हो गया इस लिए उनके छोटे पुत्र दुर्लभराज को राजा बनाया गया.

दुर्लभराज 


यह राजा चामुंडाराज के छोटे पुत्र थे. उन्होंने लआत प्रदेश के राजा कीर्तिराज को हराया था और अणहिलपुर यानी पाटण में उन्होंने गुजशाडा, धनशाडा और दुर्लभ सरोवर बनवाया था.

भीमदेव - 1


भीमदेव इतिहास में भीमदेव बानावली के नाम से प्रसिद्द थे. उनकी दो पत्निया थी रानी उदयमति और रानी बकुलादेवी. रानी उदयमति ने पाटण में राणकी वाव बनवाई थी. और मोढेरा का सूर्य मंदिर भी उसके समय में बनाया गया था. जान्यु 1026 में महोमद गजनवी ने सोमनाथ को लुटा था. और उसके समय में विमलशाह मंत्री थे.

कर्णदेव सोलंकी 


यह रजा भीमदेव - 1 के पुत्र थे. उन्होंने अहमदाबाद के पास आशावल के भील सरदार आशावल को हराकर वहापर कर्णावती नामक नगर बसाया था. उन्होंने सोलंकी राज्यकी वृद्धि दक्षिण में नवसारी तक की थी. उनके पत्नी का नाम मिनडदेवी था और उन्होंने धोड़का में मलाव तालाब और विरमगाम में मुनसर  तालाब बनवाया था.

सिद्धराज जयसिंह


इस रजा के समय को गुजरात का सुवर्ण काल माना जाता है. सिद्धराज मिनडदेवी और कर्णदेव के पुत्र थे. इस राजा ने माडव के रजा यशोवर्मा को हराकर अवन्तिनाथ का बिरुद प्राप्त किया था और बर्बरक नामक राक्षस को हराकर बर्बरक जिष्णु बिरुद प्राप्त किया था. रुद्रमहाल भी इसी राजा के समय में बनकर पूरा हुआ था. सिद्धराज ने जूनागढ़ के राजा राखेंगार को भी हराया है और उनको हराकर सिद्धराज को सिद्धचक्रवर्ती का बिरुद मिला था। सिद्धराज ने अपने जीवन के सभी युद्ध मे जीत हासिल की है इसी लिए उनको त्रिभुवनगंज कहा गया है। इस राजा ने सोमनाथ पे लगा हुआ यात्रा का कर मीनडदेवी के कहने पर हटा दिया था। सिद्धराज के समय मे ही हेमचंद्राचार्य हो गए जिन्होंने सिद्धहेम शब्दानुशासन नामक ग्रंथ लिखा था और इस ग्रंथ को हाथी पे रख के पूरे नगर में शोभा यात्रा निकाली गई। और इस शोभा यात्रा की खास बात यह है कि इस में हेमचंद्राचार्य और सिद्धराज चल रहे थे।

कुमारपाड


कुमारपाड भीमदेव 1 के बड़े बेटे क्षेमराज का वंशज था। और क्षेमराज भीमदेव की रानी बकुलादेवी का पुत्र था। कुमारपाड उनके बहन के पति कृष्ण देव की मदद से राजा बना था। कुमारपाड का साम्राज्य उत्तर में सांभर - अजमेर तक और दक्षिण में लाटभंडल तक है वही पूर्व में भिलसा तक और पश्चिम में सौराष्ट्र कच्छ तक है। इस राजा ने सांभर के राजा अर्णराज को पराजित किया था और यह कुमारपाड की सबसे बड़ी सिद्धि मानी जाती है। कुमारपाड को गुजरात का अशोक भी कहा जाता है और उन्होंने जैन धर्म का भी प्रचार किया था और अजित नाथ की एक प्रतिमा तारंगा में स्थापित की थी। और उन्होंने अपुत्रिका का धन लेना भी बंध कर दिया और पाटण में पटोला की शुरुआत करवाई।

अजयपाड


कुमारपाड को कोई भी पुत्र नही था इस लिए उनके मरने के बाद उनके भाई महिपाड के पुत्र अजयपाड गद्दी पर आए। और उन्होंने वेद धर्म का प्रचार किया था और इसी वजह से जैन धर्मी नाराज़ हो गए थे। अजयपाड कि काफी कम उम्र में ही मृत्यु हो गई थी। और ऐसा भी कहा जाता है कि अजयपाड की हत्या उनके ही एक सिपाही विजय देव ने की थी।

मूडराज - 2


मूडराज 2 के समय मे गुजरात पर मोहम्मद घोरी ने आक्रमण किया था उस वक्त मूडराज सगीर थे इस लिए उनकी माता नायिका देवी ही शासन चलती थी और उन्होंने ही मोहम्मद घोरि को पराजय किया था।

भीमदेव - 2


भीमदेव - 2 को लोग भोंड़ा भीम के नाम से भी जानते थे और इस राजा के समय मे सोलंकी वंश की सत्ता कमज़ोर हो गई थी। इस 1198 मे मोहम्मद घोरि ने उनके गुलाम कुतुबुद्दीन को गुजरात मे चढ़ाई करनेके लिए भेजा और उन्होंने गुजरात मे चढ़ाई कर के पाटण लुटा था। एयर भीमदेव - 2 लोगोसे अपने आपको अभिनव सिद्धराज और चप्तम चक्रवर्ती कहलवाते थे। और इसी प्रकार सोलंकी वंश के नाश की शुरुआत हुई।

त्रिभुवनपाल


सोलंकी वंश के यह आखरी राजा थे और उनको धोड़का के महामंडेश्वर विरधवन के पुत्र विशडदेव ने मार दिया था।

वाघेला वंश


विशडदेव वाघेला


यह राजा वाघेला वंश के प्रथम राजा थे और वाघेला वंश के स्थापक भी थे। और उन्होंने अभिनव सिद्धराज और अमर अर्जुन नाम धारण किया और उन्होंने एक नगर की स्थापना की थी जिसका नाम उन्होंने विस नगर रखा था। इस राजाके दो मंत्री थे वस्तुपाड और तेजपाड और उन्होंने आबू में देलवाड़ा के डेरे बनाए थे। देलवाड़ा डेरे में देराणी जेठानी का मंदिर भी आया हुआ है। वाघेला वंश का यह पहला राजा था जिसने दभोई के किले में वेदनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया था।

अर्जुनदेव वाघेला


अर्जुनदेव के शासन में सोमनाथ में मस्जिद बनानेकी परवानगी मिली थी। और इन्होने मालव नरेश को हराया था और सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्वार किया था।

कर्णदेव वाघेला


कर्णदेव को इतिहास में करण घेलो के नाम से भी जाना जाता था। उनके एक मंत्री थे जिसका नाम था माधव, उन्होंने अलाउदीन खिलजी को गुजरात पे आक्रमण करके उसे जितनेका न्योता दिया था और उसकी वजहसे उलुधखान और नसरतखान नमक दो सैनिक ने गुजरात पे आक्रमण किया और इस वंश का नाश हुआ था।

वाघेला वंश के साथ ही हिन्दू राजा के शासन का भी अंत आ गया था।

दिल्ली सल्तनत


खिलजी वंश


खिलजी वंश के स्थापक का नाम अलाउदीन खिलजी था

अलाउदीन खिलजी


इस 1606 मे अलाउद्दीन खिलजी ने अल्पतखान को गुजरात का शाषक चुना था और सारा वहीवट उनके हाथ मे दिया था। अलाउद्दीन खिलजी ने रोज मर्रा की सारी चीजोपे भाव नियमन किया था और चितोड़ के राजा रतन सिंह की एक सुंदर रानी थी उनको पाने के लिए अलाउद्दीन नेचितोड पर हमला कर दिया था।

मलिक काफूर


मलिक काफूर अलाउद्दीन खिलजी के गुलाम थे जोकि उन्हें गुजरात पे चढ़ाई करते वक्तमिले थे। अलाउदीन खिलजी के बाद दिल्ली में इस 1316 से लेकर 1320 तक मल्लिक काफूर ने शासन किया था।

खुशरो खो


यह खिलजी वंश के आखरी सुल्तान थे और इस 1320 में खुशरो खो को मारके तुघलक वंश की शरुआत हुई थी।

तुघलक वंश


ग्यासुद्दीन तुघलक


इस वंश की स्थापना ग्यासुद्दीन तुघलक ने की थी।

मुहम्मद तुघलक


मुहम्मद तुघलक उनकी तरंगी योजना ओ के कारण तरंगी राजा के नाम से जाना जाता है. जैसे की दो आब में कर ज्यादा करना, खुरासान आक्रमण, राजधानी प्रदेश में परिवर्तन, और सांकेतिक मुद्रा का चलन इन सभी योजना के कारण इस राजा को तरंगी कहा जाता है.

फिरोजशाह तुघलक


उन्होंने फिरोजाबाद और जोधपुर इन दोनों शहर को बसाया था और नहर की शरुआत की थी. उन्होंने पहलेके लगभग 20 जितने कर को नाबूद किया और सिर्फ 3 कर ही चालू रखे

  • खिराज (जमीन पर लगनेवाला कर)
  • खम्स (लुट का पांचवा हिस्सा)
  • जकात
उन्होंने जमीन को फिरसे नाप के उसपे लगने वाले कर को कम किया. मुस्लिम को उनकी आमदनी का 2.5 % और बिन मुस्लिम को जजिया कर यह दोनों कर अलग से डाले.

नसरुद्दीन महम्मद तुघलक


इस 1398 में तैमुरलंग नमक आक्रमण दिल्ली पर हुआ था जिसमे इस वंश का और दिल्ली सल्तनत का खातमा हुआ था.

स्वतंत्र सुल्तान शासन


तातरखान


इस राजा में दिल्ली जित्नेकी बहुत ही महत्वाकांक्षा थी और इसके लिए उन्होंने गुजरात में काफी सैन्य भी इकठ्ठा किया था और ऐसा भी कहा जाता है की एक साजिश के तहत उनके पिता ने ही उनको ज़हर खिलाकर उनकी हत्या करदी थी.

ज़फरखान


ओक्टोबर 1407 में ज़फरखान ने बीरपुर मुकाम पे स्वतंत्र सुल्तान की सत्ता हासिल की थी. उनको मुज़फरशाह - 1 के नाम से भी जाना जाता था.

अहमदशाह - 1


अहमदशाह - 1 को गुजरात का वास्तविक स्थापक माना जाता है. उन्होंने 13 अप्रैल 1411 में कर्णावती नगर के पास अहमदाबाद शहर की नीव राखी थी. और उन्होंने भद्र का किल्ला जामा मस्जिद और तीन दरवाज़ा जैसी बड़ी इमारातोका निर्माण करवाया था और जामा मस्जिद हिन्द की सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाती है. उनके गुरु का नाम शेख अहमद खटुगंज बक्श था. उन्होंने हाथमती के किनारे अहमदनगर बसाया था जिसका नाम अभी हिमतनगर है. इस राजा ने सबसे पहले समुद्री काफिला बनके उसका मथक खंभात बन्दर को रखा.

कुतुबुद्दीन अहमदशाह


इस राजा ने अहमदाबाद में काकरिया तालाब और नगीना वाडी बनवाई थी.

 फतेहखान


इस राजा ने जूनागढ़ के राजा रा - मांडलिक को हरके जूनागढ़ और चंपानेर के राजा जयसिंह पताई रावल को हराके पावागढ़ जित लिया. इस प्रकार फतेहखान ने दो गढ़ जीते थे और इसी लिए उनका काम महमद बेगाड़ो पडा. और यह राजा मौसम और रुतु के अनुसार अपने रहनेका स्थान बदलता रहता था. बरसात में चापानेर गर्मियोमे अहमदाबाद और सर्दियोमे जूनागढ़ में रहता था. उन्होंने जूनागढ़ को एक नया नाम भी दिया था जोकि है मुस्तुखाबाद और चापानेर को गुजरात की राजधानी बनाई थी और उसका नाम महेमदाबाद रखा. महमद बेगड़ाने वात्रक नदी के किनारे भमरिया कुवा भी बनवाया था. उह्को गुजरात का अकबर कहा जाता है और उन्होंने अहमदाबाद के चारो और कोट बनवाया था.

खलीलखान 


वह महम्मद बेगड़ा का पुत्र था और उसने मुज़फ्फरशाह - 2 की पदवी हासिल की थी उन्होंने वडोदरा के पास एक नगर बसाया था जिसका नाम दोलता बाद था। जब हुमायु के साथ युद्ध चल रहा था तब पोर्टूगल के गवर्नर निनोड़ि कुन्हा ने उनकी मदद की थी और उसके एवज़ में उनको दीव और दमन में व्यापार करने की छूट मिल गई।

मुज़फ्फर शाह - 3


उनके वज़ीर एतिमाद खान ने अकबर को गुजरात जितने का न्यौता दिया और इसी कारण वश सन 1572 में अकबर ने गुजरात पर आक्रमण कर दिया और इस वंश का अंत होगया।

मुगल सल्तनत


अकबर


अकबर मुगल सल्तनत का स्थापक था। मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका गुजरात का पहला मुगल शासक था जिसने अकबर ने गुजरात मे भेजा था। अकबर ने सन 1572 में गुजरात को जीता था और इसी याद में उन्होंने फतेहपुर में बुलंद दरवाज़े का निर्माण करवाया। उसके समय मे हिंदी साहित्य का सर्जन हुआ था। और उसने नए सिरे से महसूल यानी कि कर वसूलने की पद्धति चालू की।

जहांगीर


जहांगीर अकबर के पुत्र थे और उन्होंने अहमदाबाद की टंकशाडा नक्षत्र वाले सिक्के निकाले थे. उनका वास्तविक नाम सलीम था. जब वह राज गद्दी पर आए तो उन्होंने निरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीर ऐसी उपाधि धारण की थी. कच्छ प्रदेश के दो राजा थे जिनका नाम जाम और बहरा था उन दोनों ने कर नहीं भरा था इसी लिए जहाँगीर ने उन दोनों राजा ओ को हरा कर मुग़ल के शरण में लादिया. सन 1608 में कप्तान होकिंग्स हेक्टन नाम के जहाज़ में बैठ कर सूरत बन्दर पे आया था और सन 1613 में जहाँगीर ने सर टोमस रो को व्यापार करनेकी परवानगी देदी और उन्होंने सूरत में पहला व्यापारी मथक खोला था. जहाँगीर की पत्निका का नाम नूरजहाँ था.

शाहजहा


शाहजहा जहाँगीर का पुत्र था. उन्होंने अहमदाबाद में शाहीबाग और मोतीबाग महेल बनवाये थे. उनके समय में खानजाहा नामक अफ़ग़ान सरदार ने विद्रोह किया था.

औरंगज़ेब


औरंगज़ेब चुस्त सुन्नी मुसलमान था और इतना ही नहीं वह अहस्तु मुसलमान था और उन्होंने हिन्दुओ के पवित्र त्योहार होली और दीवाली पर प्रतिबंध लगा दिया। और इसीलिए उसे धर्माद राजा भी कहा जाता है। उसके समय मे शिवाजी ने 1664 और 1670 दो बार सूरत को लूटा था। सन 1707 में उनका देहांत हुआ था।

मराठा युग


दामाजीराव गायकवाड़


यह मराठा युग के स्थापक थे।

मल्हारराव गायकवाड


वेलेस्डेकी सहायकारी योजना को स्वीकार करने वाका पहला राजा था. 

सयाजीराव गायकवाड


यह राजा वड़ोदरा में रहते थे और इस राजा ने लक्ष्मीविलास पेलेस बनवाया था. और उन्होंने महाराह सयाजीराव यूनिवर्सिटी की भी स्थापना की थी. 1939 में इन्होने गुजरात में रेडिओ सेवा चालू करवाई. सयाजीराव ने मुफ्त शिक्षण चालू करवाया. और सर्वप्रथम ट्रेन उतरण से अंकलेश्वर के बिच इनके समय में चालू हुई थी.

पप्रतापसिंह गायकवाड


इस राजा के दौरान वड़ोदरा भारत संघ के साथ जुदा था.

ब्रिटिश युग


सन 1875


दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 में हुआ था. उनका मूल नाम मुडशंकर था और उनके एक गुरु भी थे उनका नाम विरजानंद था. 1875 में उन्होंने मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी. इसके अलावा उन्होंने एक ग्रन्थ भी लिखा था जिसका नाम था सत्यप्रकाश जिसमे उन्होंने वेदों की और वापस मुडो ऐसा सूत्र दिया था. 1883 में जोधपुर में उनकी मृत्यु हुई थी.

सन 1885


सन 1885 में एलन ओक्टोविन ह्युम के द्वारा कोंग्रेस की स्थापना की थी. जिसका पहला अधिवेशन गोकुलदास संस्कृत पाठशाला में रखा गाया था जिसके अध्यक्ष व्योमचंद्र बेनर्जी थे. इस अधिवेशन में अलग अलग 72 प्रतिनिधि ने अपनी हाजरी दीथी.

सन 1886


सन 1886 में कांग्रेस के दुसरे अधिवेशन का आयोजन हुआ जिसके अध्यक्ष दादाभाई नवरोजी थे. वह प्रथम गुजरती और प्रथम पारसी अध्यक्ष थे. दादाभाई नवरोजी पारसी समुदाय रहनुमोई - मजदयबन के भी अध्यक्ष थे. रास्ते गोफता उनका मुख पत्र था.

सन 1902


गुजरात में अहमदाबाद में अधिवेशन का आयोजन हुआ जिसके अध्यक्ष सुरेन्द्रनाथ बेनर्जी थे.

सन 1905


मांडवी के श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंडन में इंडिया हाउस की स्थापना की थी और उसके आलावा मेडम भिखाइजी कामा ने जिनीवा में वन्देमातरम नामक मेगेजिन चलाया था.

सन 1907


सूरत में कांग्रेस के अधिवेशन का आयोजन हुआ जिसके अध्यक्ष रास बिहारी घोष थे. और इस अधिवेशन में जहाल और महाल दो पक्ष बन गए. जहाल पक्ष में जहालवादी नेता थे जिसके विचार धरा उग्र थी और इसमें लोकमान्य तिलक, बिपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय का शमावेश हुआ था. महाल पक्ष में महालवादी नेता थे जो नरमवादी थे और उस में गोपालकृष्ण गोखले, व्योम्चंद्र बेनर्जी, दादाभाई नवरोजी शामिल थे. मेडम भिखाइजी कामा ने जर्मनी में स्टेटगार्ड में राष्ट्रद्वाज बनाके फहेराया था.

सन 1915


गांधीजी विदेश से वापिस आए थे.

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